बेटी होने के ही कारण, यूँ ना मुझको मार दे माँ……..

मैंने कब चाहा मुझे तू, ये सारा संसार दे माँ,
अपनी गोदी में बिठाकर, थोडा सा तो प्यार दे माँ………
मैं अगर जन्मी हूँ बेटी, इसमें मेरी है खता क्या,
बेटी होने के ही कारण, यूँ ना मुझको मार दे माँ……..
कोख में काटा गया है, मुझको करोड़ो बार मैया ,
बेटी होने की सजा ना, मुझको बारम्बार दे माँ ……….
क्यों मुझे समझो अभागी, दो घरों की लाज हूँ मैं,
तुझसे हूँ मैं, हूँ तुझी सी, पल दो पल ही दुलार दे माँ………
नारी हो कर क्यों नारी की, व्यथा तू माँ समझ ना पाए,
मुझको फलने फूलने दे, जीवन का तू सार दे माँ……….
एक नई पीड़ी का निर्माण, मुझको ही करना है मैया,
मुझको जीवित रख के तू, स्रजन का अधिकार दे माँ…….

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मेरी हत्या करके मैया, एक दिन बहुत पछताएगी तू,
इस धरा को एक दिन, नारी विहीन कर जाएगी तू,
इस धरा पर फिर मनुज का, आगमन होगा तो कैसे?
कोख ही जब ना रहेगी, सन्तति कहाँ से लाएगी तू?
श्रष्टि का विस्तार सारा, तेरे मेरे दम से है माँ,
मेरी हत्या करके धरती, इंसान विहीन कर जाएगी तू,
इसलिए कहती हूँ मैया, मुझको जीवन सार दे तू,
मुझको जीवन देके मैया, रचना का अधिकार दे तू,

6 thoughts on “बेटी होने के ही कारण, यूँ ना मुझको मार दे माँ……..

  1. 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

    दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका – अशोक बजाज रायपुर

    ग्राम-चौपाल में आपका स्वागत है
    http://www.ashokbajaj.com/2010/11/blog-post_06.html

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