गुड़ी पड़वा:- नव वर्ष पर विशेष

दुनिया भले ही नया साल जनवरी से मनाती है, लेकिन सनातन कालगणना में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नववर्ष की शुरुआत मानी गई है। पुराण कहते हैं कि इसी दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। मतलब ये दिन मानव सभ्यता के अभ्युदय का दिन है। किसी अन्य नववर्ष से ज्यादा महत्वपूर्ण और मान्य है आज का दिन।

  • 2076 साल पहले संवत की शुरुआत मानी गई, संवत के 60 नाम तय किए गए
  • होली के अगले दिन से चैत्र महीना शुरू होता है, लेकिन नया साल 15 दिन बाद
  • विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे

गुड़ी पड़वा से जुड़ी विशेष बातें

  1. चैत्र महीना लगने के 15 दिन बाद क्यों मनाया जाता है नया साल

    अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि पंचांग (हिंदू कैलेंडर) में तो चैत्र महीना होली यानी फाल्गुन पूर्णिमा के अगले दिन ही शुरू हो जाता है। इसे चैत्र कृष्ण प्रतिपदा कहा जाता है तो नया साल 15 दिन बाद क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे अलग सोच और मान्यता है, जो भारतीय दर्शन की महानता को दिखाती है।

    वास्तव में चैत्र मास होली के दूसरे ही दिन से शुरू हो जाता है, लेकिन वो समय कृष्ण पक्ष का होता है। मतलब पूर्णिमा से अमावस्या तक का। इन 15 दिनों में चंद्रमा लगातार घटता है और अंधेरा बढ़ता जाता है। सनातन धर्म “तमसो मां ज्योतिर्गमय्” यानी अंधेरे से उजाले की ओर जाने की मान्यता है। इस कारण चैत्र मास लगने के बाद भी शुरू के 15 दिन (पूर्णिमा से अमावस्या तक) छोड़ दिए जाते हैं। अमावस्या के बाद जब शुक्ल पक्ष लगता है तो शुक्ल प्रतिपदा से नया साल मनाया जाता है, जो अंधेरे से उजाले की ओर जाने का संकेत है। अमावस्या के अगले दिन शुक्ल पक्ष लगता है, जिसमें हर दिन चंद्रमा बढ़ता है, उजाला बढ़ता है।

  2. क्या है विक्रम संवत : अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल है आगे

    उज्जयिनी (वर्तमान में मप्र का उज्जैन) राजा विक्रमादित्य का राज्य था। यहीं से विक्रम संवत की शुरुआत मानी गई है। राजा विक्रमादित्य के नाम से ही ये संवत है। ज्योतिषीय गणना कहती है कि कोई 2076 साल पहले से इसकी शुरुआत हुई जो कि अंग्रेजी साल से भी आगे का है। ईसवी संवत अभी 2019 पर है।

  3. संवत्सरों के 60 नाम

    ज्योतिष ने संवत्सरों के नाम भी तय किए हैं। जो करीब 60 साल में एक बार आता है। इस बार के संवत का नाम है “परिधावी संवत्सर”। इस संवत के राजा शनि हैं और मंत्री सूर्य।

    दोनों पिता-पुत्र है लेकिन विरोधी हैं। पिता-पुत्र की विचारधाराओं में विरोधाभास कोई नया नहीं है। सृष्टि के आरंभ से ये है। कारण है, दोनों अलग-अलग पीढ़ियों के हैं, दोनों का अपना-अपना समय है, इसलिए विरोध है। लेकिन ये विरोध मत का है, मन का नहीं। पिता परंपरा का प्रतिनिधि होता है, पुत्र परिवर्तन का। परंपराओं का सम्मान पुत्र करें, पिता परिवर्तन को स्वीकार करें।

  4. भगवान और भक्त, दोनों इसी महीने जन्मे

    विक्रम संवत के साथ चैत्र नवरात्र भी शुरू हो रहे हैं। चैत्र नवरात्र शक्ति की साधना का समय है। नौवें दिन भगवान राम का जन्मोत्सव और फिर पूर्णिमा पर हनुमान का अवतार। भगवान और भक्त, दोनों इस महीने में जन्मे।

    एक मर्यादा की मूर्ति, दूसरे शक्ति और भक्ति के अवतार। कई मायनों में चैत्र महीना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी व्रत-पर्व परंपरा इस तरह से बनाई गई है कि वह जीवन का दर्शन बताती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नया साल और नवरात्र का पहला दिन। फिर रामनवमी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म उत्सव। फिर पूर्णिमा पर मनाया जाता है हनुमान जन्मोत्सव। हनुमान प्रतीक हैं शक्ति, शील, निष्ठा, आत्मविश्वास और भक्ति के।

  5. तुलसीदास जी ने मोह त्यागने की बात कही थी

    रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है “मोह सकल व्याधिन कर मूला”। सारी बीमारियों की जड़ मोह ही है। मोह का अर्थ है जो मन पर हावी हो जाए। इसलिए अपने मन को मुक्त रखें।

    इस चैत्र से अगर आप अपने लिए कोई रिजोल्यूशन चाहते हैं तो मोह का त्याग करने का संकल्प लें। कोशिश करें किसी चीज में इतने आसक्त ना हों कि वो आपकी बीमारी का कारण बन जाए। प्रेम अपनी जगह है, लेकिन प्रेम की अधिकता मोह जगाती है। राम से मर्यादा का पाठ सीखें, कोई भी चीज जो आपको प्रिय है, वो उतनी ही प्रिय रहे कि जब वो आपसे अलग हो तो आपके मानसिक असंतुलन का कारण ना बनें। राम के जीवन में कई प्रसंग आए हैं। सबसे अच्छा उदाहरण है राम वनवास का। शाम को युवराज घोषित किए गए, राज्याभिषेक की विधि शुरू हो गई और अगले दिन सुबह वनवास मिल गया। राजा बनते-बनते वनवासी हो गए। लेकिन, राम असंतुलित नहीं हुए। सिंहासन दूर हो गया लेकिन विचलित नहीं हुए। वनवास पर शोक नहीं जताया। खुशी जाहिर की। ये होता है मोह रहित होना। जो आपका था, वो आपका नहीं रहा लेकिन आप अविचलित हैं तो आप मोह से रहित हैं। अगर मोह से परे हैं तो फिर आप स्वस्थ्य जीवन की ओर हैं। क्योंकि मोह मन को कमजोर करता है, कमजोर मन से कभी स्वस्थ शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः अपने को आसक्ति से परे रखकर जीवन में आगे बढ़ें।

  6. चैत्र प्रतिपदा की खासियत

    हिंदू नव वर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नव संवत भी कहते हैं। इस बार हिंदू नव वर्ष 29 मार्च से शुरू हो गया है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादि आदि नामों से भारत के अनेक क्षेत्रों में मनाया जाता है।

    ब्रह्म पुराण के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य शुरू किया था। इसीलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिन माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार चारों युगों में सबसे प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ था। इस दिन से सृष्टि का कालचक्र प्रारंभ हुआ था। इसे सृष्टि का पहला दिन भी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक भी गुड़ी पड़वा पर ही हुआ था। वहीं, धर्मराज युधिष्ठिर भी इसी दिन राजा बने थे और उन्होंने ही युगाब्द (युधिष्ठिर संवत) का आरंभ इसी तिथि से किया था। मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्र भी इसी तिथि से प्रारंभ होता है। ऐसी मान्यता है कि साल के पहले नौ दिनों में माता की आराधना से प्राप्त शक्ति से साल भर जीवन शक्ति का क्षय नहीं होता। उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के सम्राट विक्रमादित्य ने भी विक्रम संवत् का प्रारम्भ इसी तिथि से किया था। महर्षि दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन की गई थी।

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