बहुमत की सरकार में कोंग्रेस का योगदान

सम्पादकीय :- राकेश गुप्ता

कांग्रेस जोर शोर से पूरे देश मे चुनाव लड़ रही है, अपने घोषणापत्र में तमाम बड़े बड़े वादे भी कर रही है। मकसद साफ है किसी भी प्रकार सरकार बनाना।

चलिए एक आकलन करते हैं क्या वाकई कोंग्रेस सरकार बनाने की स्तिथि में है। कांग्रेस पूरे देश मे 230 सीट से लड़ रही है और बहुमत के लिए 273 चाहिए इसे कहते है विश्वास का ओवर डोज या जनता से मजाक। जो दल बहुमत के लिए जरूरी सीटों पर ही चुनाव नही लड़ रहा उसके सभी उम्मीदवारों के जितने का दिवास्वप्न हम देख लेते है, मान लेते है उसके सभी उम्मीदवार जीत गए मगर उसके बाद क्या?

उसके बाद कि स्तिथि पर भी गौर कर लेते हैं, क्षेत्रीय दल उस समय किंग मेकर की भूमिका में होंगे, एक खिचडी सरकार देश पर शासन कर रही होगी जिसकी डोर अखिलेश यादव, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, ममता या तेजस्वी यादव जैसे लोगों या अन्य छोटे दलों के हाथ मे होगी जो अपने अनुसार सरकार को निर्णय लेने के लिए बाध्य करेंगे। अतीत में हम खिचड़ी सरकारों का हश्र भी देख चुके है और उनके बंधे हुए हाथों को भी हमने देखा है।

निःसन्देह हमारे ऐसा लिखते ही लोगों में सन्देश जाएगा कि हम भाजपा को वोट देने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे है।

नही ऐसा नही है भाजपा नीत शासन में बहुत सी बातों से लोग परेशान रहे, नोट बन्दी, GST और सीलिंग जैसे मसलों को लोग आज भी भूले नही है। 2014 के भाजपा घोषणापत्र में किये गए वादों को पूरा ना करने का मोदी सरकार का कारनामा भी लोगों ने देखा है। सरकार के प्रति आक्रोश का ही नतीजा था तीन बड़े राज्यों में भाजपा की हार। इसलिए 2019 के आम चुनाव में भाजपा की सत्ता की राह यकीनन आसान नही थी।

आज के संपादकीय में असल मे हम जनता से नही कांग्रेस आलाकमान से मुखातिब हैं, हम पूछना चाहते हैं राहुल गांधी से की क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास 543 उम्मीदवार भी नही हैं, क्या हार के डर से लड़ना छोड़ दिया है। क्यों विश्वास नही है अपने आप पर और क्यों इक्षाशक्ति नही है मोदी सरकार की कमियों को भुनाने की।

हम कांग्रेस आलाकमान को याद दिलाना चाहते है कि सरकारों के सभी फैसले लोकहित में होते हुए भी सभी को मान्य नही होते है। हर फैसले के समर्थन और विरोध में बहुत सारे लोग होते है। हम कोंग्रेस या भाजपा समर्थक या विरोधी नही है, हम याद दिलाना चाहते है 2014 के आसपास हुई गलतियों को जिसने कांग्रेस को 44 सीटों पर समेटने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। महत्वपूर्ण भूमिका अदा की कांग्रेस के ताबूत में एक कील ठोकने में।

कांग्रेस को याद आना चाहिए अन्ना आंदोलन, सत्ता की गलतियों से उपजा जन आक्रोश, उस दौरान लोगों की भावनाओं को ना समझ पाने का ही नतीजा था कि राष्ट्रीय दल देश और दिल्ली सहित एक सम्मानीय विपक्ष की भूमिका में भी नही आ सका। उस दौरान राहुल गांधी ने मौन से उपजे असन्तोष का साथ देने की जगह मौन का साथ दिया। राहुल के पास एक मौका था केजरीवाल की तरह हीरो बनने का जो उन्होंने गंवा दिया।

पुलवामा हमले के समय आया राहुल गांधी का बयान सभी को याद है, मगर कांग्रेस यहां भी जनमानस की भावनाओं को समझने में धोखा खा गई, या फिर अपनी नीतियों के चलते बैकफुट पर आ गई। सिद्धू और दिग्विजय जैसे नेताओं के बयानों ने फिर एक बार आग में घी का काम किया।

हम चुनाव पूर्व ये सब लिख रहे है, पुलवामा से पहले मोदी सरकार बैकफुट पर थी मगर पुलवामा ने एक बार फिर हवा का रुख भाजपा की ओर मोड़ दिया है मगर उसमे पुलवामा से अधिक कांग्रेस की पाक समर्थित नीतियों का बड़ा हाथ है। बड़ा हाथ है शहादत पर सवाल उठाने और अजहर जैसे आतंकियों के प्रति सम्मान के भाव दिखाने का।

कांग्रेस को अपने आपको बचाना है तो राष्ट्रवाद की भावना के साथ मजबूती से खड़े होने की नीति को कार्यान्वित करना होगा, वोट बैंक की, तुस्टीकरण की राजनीति को हर हाल में त्याग करना होगा, भाजपा से छीनना होगा वह तमगा की केवल वही राष्ट्रवादी है और इसके लिए जमीन पर बड़ा करके दिखाना होगा। कांग्रेस के थिंक टैंक को सोचना होगा कि देश का सबसे पुराना दल आज इतनी बदतर स्तिथि में क्यों है। चुनाव आते जाते रहेंगे, हार जीत भी होती रहेगी मगर देश मे सरकार से ज्यादा एक मजबूत विपक्ष की जरूरत होती है जो सत्ता को निरंकुश ना होने दे, हमारा मानना है कि देश मे वर्तमान लोकसभा में विपक्ष था ही नही, या होकर भी ना होने के बराबर था।

इस चुनाव में परिस्थितियों में बदलाव आएगा, सरकार प्रचण्ड बहुमत से नही होगी, और विपक्ष सम्मानित स्तिथि में होगा। आप जोड़तोड़ की राजनीति त्याग कर मजबूत विपक्ष बनने के लिए कमर कस लीजिये। सत्ता से लोगों का मोहभंग अवश्य होता है। आप विपक्ष में रहकर इतना मजबूत हो जाइए की 2024 में पूरी 543 सीटों पर चुनाव लड़ सको जीतना और हारना कोई विषय नही है, विषय है पूरी मजबूती के साथ खड़े होना।

राकेश गुप्ता

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