UP पुलिस के सुपरकॉप अमिताभ यश की पूरी कहानी

जानिए यूपी पुलिस के सुपरकॉप अमिताभ यश की पूरी कहानी

सुनील वर्मा। 

पुलिस महकमा जब उन्‍हें कोई टास्‍क देता है तो वे उसे चुनौती मानकर अंजाम तक पहुंचाते है। खाकी के पीछे छिपी इस शख्सियत की दहशत का आलम ये है कि दुर्दांत अपराधी भी ये दुआ का करते है कि उनका सामना कभी इस सुपर कॉप से ना हो। क्‍योंकि अपने मिशन के पूरा करना इनका जुनून बन जाता है। वे अपने काम को पदक, पोस्टिंग और प्रमोशन के मोह से दूर रहकर अंजाम देते है। एक जमाने में जब ददुआ जैसा कुख्‍यात डकैत उत्‍तर प्रदेश पुलिस के लिए आतंक बन गया था तब यूपी पुलिस के इसी सुपरकॉप यानि अमिताभ यश ने ददुआ का खात्‍मा करने की जिम्‍मेदारी ली और उन्‍होंने इस मिशन को बखूबी पूरा कर दिखाया। यूपी में ऐसे कई महत्‍वपूर्ण ऑपरेशन हुए है जिनको पूरा करने के दौरान अमिताभ यश ने कई अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया। अपने काम करने की शैली से अमिताभ ने पुलिसिंग को नए आयाम दिये हैं।

अमिताभ यश

1996 बैच के यूपी कैडर के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अमिताभ यश मूल रूप से बिहार के रहने वाले है। उन्हें उनके सख्त रवैयों और अपराधियों के सफाए के लिए जाना जाता है। उनका मानना है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं। अमिताभ के पिता श्री राम यश सिंह भी देश के बेहतरीन आईपीएस अफसरों में से एक रहे हैं। अमिताभ यश ने हाईस्कूल पटना के सेंट मिशेल हाईस्कूल से किया। हाईस्कूल करने के बाद वे दिल्ली आ गये और दिल्ली के डीपीएस आर.के पुरम से इंटर पास किया। दिल्ली के ही सेंट स्टीफेन कॉलेज से बीएससी आनर्स किया और कानपुर आईआईटी से एमएससी। वे अपने डिपार्टमेंट के टॉपर और पढ़ाई में हमेशा से होशियार रहे।

अमिताभ यश

अमिताभ यश ने एसटीएफ में रहकर लगभग तीन दर्जन से ज्यादा डकैतों का खात्मा किया है। उन दिनों के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, ‘वो दौर मुश्किल तो था, लेकिन था बड़ा मजेदार। उस वक्त हमारे साथ टीम भी बहुत अच्छी थी, जो हमारे साथ लड़के थे कांस्टेबल से लेकर एडिशनल एसपी तक सभी अपने-अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट थे। शुरूआती दिनों में जब अनुभव कम था, तब ऊर्जा का इस्तेमाल अधिक होता था, किंतु अनुभव बढ़ने के साथ-साथ आपरेशंस में ताकत का कम, दिमाग और टेक्नोलॉजी का ज्यादा इस्तेमाल बढ़ गया।’

अमिताभ मानते है कि कोई भी गुडवर्क टीम भावना से ही संभव होता है। जिन दिनों अमिताभ यश बुदेलखण्ड में थे, तो उनके अधिनस्थ काम करने वाली टीमों ने लगभग 18 गैंग का सफाया किया था और फिरौती के लिए अपहरण करने वाले लगभग 100 से ज्य़ादा अपराधियों को मार गिराया था। उनके एसटीएफ और एसएसपी के सवा दो साल के कार्यकाल में 65 से ज्य़ादा अपराधियों का सफाया किया गया था। उस बीच कुछ ऐसे भी विशेष कार्य थे जिन्हें अमिताभ पब्लिकली डिस्कस नहीं करते। अपनी उपलब्धियों के लिए वे अपनी टीम के साथ-साथ अपने उच्चाधिकारियों के मार्गदर्शन की भूमिका को अहम मानते हैं। लेकिन 21 जुलाई 2007 को चित्रकुट, बांदा में दहशत का पर्याय बने ददुआ का एनकांउन्टर, 4 अगस्त 2007 को चित्रकुट में ही ठोकिया का सफाया और 19 मार्च 2008 को फतेहपुर में उमर केवट को मार गिराने का काम अमिताभ यश के कार्यायकाल के दौरान ही किया गया इसे यूपी पुलिस का पूरा महकमा जानता है।

पिछले दो साल से अमिताभ यूपी एसटीएफ के चीफ यानि आईजी हैं। एसटीएफ को आज यूपी पुलिस की रीढ़ माना जाता है। अपने सेवाकाल की आधी अवधि एसटीएफ में रहकर उन्होंने पांच दजन से अधिक बड़े अपराधियों को मार गिराया है। अमिताभ यश के बारे में कहा जाता है कि वह जिस जिले में तैनाती पाते हैं वहां से अपराधी या तो बेल तुड़वाकर जेल चले जाते हैं या फिर जिला छोड़ देते हैं। उनके इन्हीं तेवरों के चलते एसटीएफ के अलावा जब-जब उन्हें जिलों में तैनाती मिली तो टास्क पूरा होने के बाद उन्हें एसटीएफ में ही वापस भेज दिया गया।

अमिताभ यश

अमिताभ यश को अपराधियों से खास तरीके से निपटने के लिये भी जाना जाता है। वह कहते हैं, समाज में जिस तरह से नित-नये अपराध सामने आ रहे है, उसके लिये पुलिस अधिकारी को भी उसी तेजी से नई तकनीकों से जुड़ना चाहिए। साथ ही पुलिस बल का मनोबल भी बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि आखिर में सारी रणनीति टीम के साथ ही पूरी की जा सकती है। टीम लीडर की जिम्मेदारी होती है वह विषम परिस्थितियों में अपने साथियों पर नकारात्मकता न हावी होने दे।

आमतौर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी किसी ऑपरेशन के दौरान पीछे रहते हैं और कनिष्ठ अधिकारी आगे लेकिन यूपी पुलिस के एंग्री यंग मैन अमिताभ यश को ऑपरेशन को लीड करने का शौक है। अमिताभ की यही अदा उन्हें दूसरों से जुदा करती है।

कहते है सफलता की सीढियां चढने वालों को कुछ लोग पंसद नहीं करते और उन्‍हे नीचे गिराने की साजिश रचते रहते हैं। अमिताभ यश के साथ भी ऐसा ही हुआ।  उनकी लोकप्रियता और अपराधियों में उनके खौफ का ही नतीजा था कि डेढ साल पहले उनके खिलाफ एक जबरदस्‍त साजिश रची गई। उनके उपर सोशल मीडिया के माध्यम से 19 सितंबर 2017 को एक झूठा आरोप लगाया गया कि पंजाब के नाभा जेल ब्रेक मामले में फरार चल रहे गैंगेस्टर गुरुप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरा को उत्तर प्रदेश में एसटीएफ ने पहले तो पकड़ा औऱ बाद में छोड़ दिया, इसके लिए एक करोड़ रुपये में डील तय हुई तथा 45 लाख रुपये दे भी दिये गये। इसके पीछे दो आईजी स्तर के अधिकारियों के नाम आये लेकिन सुर्खियां बना सिर्फ एक नाम और वो नाम था अमिताभ यश का। दो अपराधियों के बीच बातचीत की आडियो क्लिप में कहा गया कि एक राजनीतिक दल से संबंध रखने वाले संदीप तिवारी उर्फ पिंटू ने अपने एक रिश्तेदार आईजी के माध्यम से दूसरे आईजी अमिताभ यश से संपर्क कर गैंगेस्टर गोपी को छुड़वा दिया। 
चूंकि मामला गंभीर था इसलिए अमिताभ यश पर लगे आरोंपो की जांच का काम यूपी के एडीजी कानून व्‍यवस्‍था आनंद कुमार को सौंपा गया। उन्‍होंने अमिताभ यश के अलावा जेल में बंद उन अपराधियों से भी मुलाकात कर जांच पडताल की जिनकी बातचीत की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। लंबी जांच के बाद भी अमिताभ यश पर लगे आरोपो साबित नहीं हो पाए  और वे जांच में बेदाग निकले ।

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